सोमवार, 17 मार्च 2014

खुशियों के रंग (बाल कथा )

    त्यौहार का दूसरा नाम होता है खुशियां। कोई भी त्यौहार हो जैसे -जैसे नज़दीक आने लगता है। मन में अपने आप ही उल्लास का समावेश होने लगता है।होली तो सभी का प्रिय त्यौहार होता है। होता भी क्यूँ नहीं इस दिन रंग -पानी खेलने की पूरी छूट होती है।
  लेकिन होली तो आने को है और नन्हा रघु उदास है। क्यूँ उदास है वो ? क्यूंकि वह पिछले दो सालों की तरह इस बार भी होली नहीं मनाएगा। मन मसोस रहा है कि इस बार भी घर की छत से ही दूसरे बच्चों को रंग खेलते हुए देखेगा। उसे याद आ रहा है कि किस तरह वह पंद्रह दिन पहले ही अपने मित्रों के साथ होली में रंग खेलने की योजना बनाने लग जाता था। छोटी कक्षा में था इसलिए पढाई का भी ज्यादा जोर नहीं था और तब तक परीक्षाएं भी हो जाती थी।
  परीक्षाएं तो इस बार भी दो दिन पहले ही ख़त्म हो जायेगी। फिर क्यूँ नहीं खेल सकता वह ?
रघु धूप में रखी चारपाई पर लेटा सोच रहा था। तीन साल पहले होली के दिन जब वह होली खेल कर घर लौटा तो देखा कि उसके माँ -पापा बदहवास से थे। उसकी मम्मी उसके छोटे भाई श्याम को तैयार कर चुकी थी। उसे देखते ही उसे भी जल्दी से स्नानघर की  तरफ ले चली और कहा की जल्दी से नहा ले। वह सोच में पड़  गया कि आज माँ  ने उसे नहलाया क्यूँ नहीं। हर बार तो वह खुद रगड़ -रगड़ कर रंग छुड़ाती है उसका।
    जैसे तैसे नहा कर बाहर आया तो उसने अपने पापा के रंग लगा-उतरा चेहरा बदरंग सा दिखा। थोड़ी ही देर में वे अपनी कार में सवार हो कर गाँव की  तरफ जा रहे थे। रघु ने पूछा तो माँ  ने रोते हुए बताया कि उसके दादा जी नहीं रहे।
    वह सकते में आ गया। यह तो उसने सोचा ही नहीं था कि ऐसा भी दिन आएगा कभी। वह तो सोचता था कि सभी साथ -साथ ही रहेंगे। कोई छोड़ कर भी जा सकता है।ऐसा तो कभी नहीं सोचा था उसने।  गाँव जाकर माहौल देख कर वह और उसका भाई सहम से गए। दादा जी कितना प्यार करते थे सभी को। जब भी उनके पास रहने को आते थे तो घर में उत्सव  जैसा माहौल बन जाता था। अब कौन प्यार करेगा उसे। सोच कर मन में हूक सी उठी लेकिन जोर से रो भी नहीं सका बस सहमा सा रहा। दादा जी को जाते देखता रहा।
    कुछ दिन बाद वे सब शहर आ गए।
     जिंदगी फिर से चल पड़ी अपनी राह पर। लेकिन दादा जी की  कमी तो हमेशा ही रहती थी रघु के जीवन और मन में। वह बहुत याद करता था उनको।
     " रघु !" माँ ने पुकारा तो वह नीचे आँगन में आ गया।
" माँ , क्या इस बार भी हम होली नहीं मनाएंगे ?" रघु की आवाज़ में कई सारे भाव एक साथ थे।
" नहीं बेटा , होली के दिन तेरे दादा जी की मृत्यु हुई थी। इसलिए हम कोई भी त्यौहार और ख़ुशी इस दिन नहीं मनाएंगे। " माँ ने समझाते हुए कहा।
" लेकिन माँ ! दादा जी भी तो कितना खुश हो कर रंग खेलते थे। आज जब हम नहीं खेलेंगे तो क्या उनकी आत्मा खुश होगी। " रघु ने अपनी बात रखने की कोशिश की।
" ओह ये आत्मा की बातें मुझे नहीं मालूम। जो बड़ों ने परम्परा बना दी वही मानी जायेगी। ज्यादा बातें बनाना अच्छी बात नहीं है। " माँ थोड़ा नाराज़ होकर बोली।
  " बातें बनाना क्यूँ नहीं अच्छी बात है। रघु सच ही तो कह रहा है। " पीछे से आवाज़ आई तो देखा दादी खड़ी है साथ में उसके पापा भी।
     उसके पापा दादी को गाँव से लेकर आये थे। घर में किसी को नहीं पता था। पापा को ऑफिस में ही फोन कर दिया तो वह वही से लेने चले गए थे। रघु दादी को देख बहुत खुश हुआ। दौड़ कर गले लग गया।
   दादी ने प्यार से रघु को गले लगा कर कहा कि इस बार हम सब होली मनाएंगे। जो परम्परा खुशियों में आड़े आए वह बदल देनी चाहिए। बच्चे अगर त्यौहार पर ही उदास रहेंगे तो इसके दादा जी की आत्मा कैसे खुश रहेगी। कह कर दादी ने अपने बैग से रंग और मिठाइयां निकाल  कर  दी।  रघु और उसका भाई श्याम दोनों ही बहुत खुश थे। तीन साल बाद फिर से होली के रंगों के साथ -साथ खुशियों के रंग भी बिखरेंगे।

उपासना सियाग 

शनिवार, 1 मार्च 2014

मम्मा आप चिंता मत करो...

   बच्चे  दो प्रकार के होते हैं। एक तो न पढ़ने वाले और दूसरे वाले ना पढ़ने वाले। यहाँ थोड़ा सा सुधार करते हैं कि कम पढ़ने वाले। पढ़ने वाले बच्चे तो समय पर होमवर्क और रिविज़न करते रहते हैं। और कम पढ़ने वाले बच्चे ! वे सिर्फ परीक्षाओं में ही पढ़ते हैं।
    कम पढ़ने वाले बच्चों में ग्यारहवीं कक्षा में पढ़ने वाला मेरा छोटा बेटा प्रद्युम्न भी है। आज परीक्षा दे कर आया तो मेरे पूछने पर बताया कि उसके सौ में से 85 नम्बर आ जायेंगे।
 कमाल का आत्म विश्वास ! मुझे सुन कर हंसी आ गई।
   एक तरफ उसके चाचा का बेटा जो कि 8th में ही है। उसकी पहले परीक्षा की  चिंता से और अब रिज़ल्ट की  चिंता से नींद उड़ी  हुई है। यहाँ प्रद्युमन ने खुद ही रिजल्ट निकाल  दिया।
 मुझे याद आया जब वह सातवीं कक्षा में था। मैं बहुत चिंतित थी कि वह कैसे पास हो पायेगा।
  वह प्यार से गले में बाजू डाल कर बोला , " मम्मा आप चिंता मत करो। हमारी सिस्टर ने कहा है कि 33 नंबर वाला पास है। मैं 35 नंबर तो पक्का ले आऊंगा। "
   मुझे हंसी आ गई। सोचा अब सारे  बच्चे तो प्रथम नहीं आ सकते। पढाई के पीछे बच्चे का मासूम बचपन किसलिए खोना। लेकिन चार साल तक होस्टल में भेजना पड़ा इस पढाई के लिए ही !
  अब जब घर में है तो कोई फ़िक्र नहीं है उसे। मुझे तो फ़िक्र है !
   






लेकिन उसे फ़िक्र में नहीं डालना चाहती। कुछ बच्चे 12th के बाद सम्भल जाते हैं। इसी आस में उसके साथ हंस देती हूँ।