शुक्रवार, 5 सितंबर 2014

थप्पड़

  थप्पड़

आज शिक्षक दिवस पर बच्चों ने बहुत सारे कार्यक्रम किये। जिनमें से एक में बच्चों नें हम सभी अध्यापकों के पढाने के तरीके पर अभिनय किया। बहुत हंसी आयी और पता चला कि हम कैसे और किस तरह से बच्चों को पढाते हैं। बच्चे सच में बहुत पारखी नज़र रखते हैं। एक छोटी सी नाटिका भी थी ," थप्पड़ ",जिसमें दिखाया गया था कि बच्चों पर हाथ उठा दिए जाने पर किस तरह से माता-पिता स्कूल में आकर एक शिक्षक को शिकायत करतें है या ज़लील करते हैं।
      इस नाटिका ने मुझे कई बरस पीछे धकेल दिया।  सहसा मेरा हाथ मेरे गाल पर चला गया। मेरी अध्यापिका उषा जी ने भी तो एक दिन मुझे थप्पड़ मारा था , पूरी कक्षा के सामने। ना केवल थप्पड़ ही बल्कि जोर से चिल्लाई भी , कॉपी भी फाड़ डाली थी। मैं ना रोई ना ही कुछ बोल पायी थी। गाल पर हाथ रखे रही अपमानित सी। घर आई तो माँ ने चेहरे पर नज़र डालते ही कहा की आज कुम्हार की थाप पड़ ही गई गीली मिटटी पर।
      माँ भी परेशान थी मेरे गणित में रूचि ना लेने से ,मेरी असुंदर लिखाई से। अध्यापिका जी और माँ के बहुत कहने पर भी सुधार नहीं था मुझमें। मैं तो दिन - रात उषा जी के स्थानांतरण की मन्नतें माँगा करती थी। भोला मन यह नहीं सोचता था की इनकी जगह जो भी आएँगी वह भी तो पढ़ाएगी ही !
       माँ का विचार था कि शिक्षक एक कुम्हार की तरह ही होता है। जैसे कुम्हार गीली मिटटी को थाप कर नया आकर देता है वैसे ही एक शिक्षक भी बच्चे को नए रूप में ढलता है पढ़ा कर तो कभी थप्पड़ भी लगा कर।
      सच में वह थप्पड़ मेरे लिए एक कुम्हार की थाप की तरह ही था। मैंने खुद को बदलने की कोशिश करनी शुरू कर दी और साल-डेढ़ साल बाद सुलेख प्रतियोगिता में मुझे तीसरा पुरस्कार मिला। उषा जी बहुत प्रसन्न थी। तालियों की गड़गड़ाहट में जब मैं पुरस्कार लेने गई तो मुझ में एक नया आत्मविश्वास था।
     तालियां मेरे कानों में गूंज रही थी नेपथ्य में भी और समक्ष भी , समारोह के समापन की घोषणा हो रही थी। मेरे हाथ अब भी गाल पर और आँखे नम थी।
 
उपासना सियाग




मंगलवार, 2 सितंबर 2014

छोटा राजकुमार और रहस्यमयी तोता

वीरपुर एक बहुत बड़ा राज्य था। वहां के राजा सुमेर सिंह एक कुशल प्रशाशक थे। उन्होंने अलग-अलग क्षेत्रों की देखभाल के लिए मंत्रियों की व्यवस्था कर रखी थी। विशाल सेना थी। जिससे उनकी प्रजा को कोई दिक्कत का सामना ना करना पड़े।
जगह -जगह सरायों का निर्माण करवाया हुआ था। जिससे किसी बाहर  से आने वाले यात्री को परेशानी  का सामना न करना पड़े।
उनके राज्य में अपराधों की संख्या ना के बराबर थी , इसका मुख्य कारण था वहां पर कोई बेरोजगार नहीं था।और दूसरा  कारण था वहां की सशक्त न्याय व्यवस्था जिसके चलते अपराधियों को कड़ा  दंड मिलना।
लेकिन कुछ दिनों से राजा और उनके मंत्री बहुत परेशान  थे।
कारण...?
कारण था , राजा के आम बाग़ से , कई दिनों से आम चोरी हो रहे थे।और कोई सुराग भी नहीं मिल रहा था।राजा ने सभा बुलाई कि  क्या किया जाये...! उसके राज्य में ऐसी किसकी हिम्मत हो गयी जिसको अपनी जान की परवाह ना हो ...
राजा के चार बेटे थे ...
बड़े बेटे वीर सिंह ने कहा , " पिता जी आप चिंता ना करें , आज रात मैं निगरानी रखूँगा बाग़ की , चोर मेरी नज़रों से बच  कर नहीं जायेगा। "
राजा ने अनुमति दे दी।
राज कुमार वीर सिंह ने बाग़ में ऐसी  जगह पर अपनी बैठने की व्यवस्था कर ली जहाँ से उसे हर कोई आने-जाने वाला नज़र आता रहे।
आधी रात हो गयी।
पर ये क्या हुआ ...! अचानक यह कैसी महकी सी हवा चली। और वीर सिंह एक मदहोशी में डूब गया और पता ही नहीं चला उसे कब नींद आ गयी।  सुबह किसी ने उसके चेहरे पर पानी के छींटे मारे तो आँखे खुली। देखा सामने सभी लोग चिंता के मारे उसे घेरे खड़े है। रानी माँ की आँखों से तो आंसूं थम ही नहीं रहे थे।
और वीर सिंह ...?
वो तो बेहद शर्मिंदा था ,एक राज कुंवर हो कर भी एक चोर का पता नहीं लगा पाया। पर उसका कोई कुसूर भी तो ना था।
पर राजा की परेशानी तो वैसे की वैसी ही रही। इस बार मंझले राजकुमार समीर सिंह ने अपने पिता से वादा किया  के वो चोर को पकड़ेगा ...
पर उसके साथ भी वीर सिंह वाला किस्सा हुआ। इसके बाद तीसरे राजकुमार सुवीर सिंह के साथ भी यही किस्सा हुआ।
अब तो राजा बहुत फिक्रमंद हुआ कि  एक चोर को कोई भी नहीं पकड तो क्या कोई सुराग भी नहीं पा सका है।तभी सबसे छोटा राजकुमार जोरावर सिंह कहता है, " महाराज ,आज की रात मुझे  कोशिश करने दी जाये।" राजा ने समझाया भी कि  वह छोटा है। पर उसने जिद की तो राजा को मानना ही पड़ा।
आखिर राजकुमार छोटा था तो क्या हुआ ...! था तो राजसी खून ही , तो हिम्मत भी बहुत थी और समझ भी...
वह भी वही बैठ गया जहा उसके दूसरे  भाई बैठे थे।
जैसे -जैसे मध्यरात्री का समय आ रहा था , राजकुमार और  भी चौकन्ना  हो गया था कि उसे सोना नहीं है। यह बात भी सही है अगर इन्सान दृढ निश्चय कर ले तो बहुत कुछ संभव है उसके लिए।
तो उसने क्या किया ...? जिससे उसे नींद ना आये ...!
उसने अपनी एक ऊँगली को तलवार की धार पर रगड़ कर जख्मी कर लिया। जिससे पीड़ा के कारण उसे नींद ना आये।
अब समय हो आया मध्य रात्री का ...! एक महकी हुई सी हवा चलने लगी पर छोटे  राजकुमार ने तो हवा के विरुद्द रुख कर रखा था। उसने देखा बहुत सारे तोते उड़ते हुए चले आ रहे है।और सभी आम के पेड़ों पर से एक -एक आम चुरा कर भाग रहे हैं। राज कुमार ने भाग कर बड़ी मुश्किल से एक तोते को पकड लिया।
तोते को एक पिंजरे में बंद करके रख लिया गया। अगली सुबह उसे लेकर राजकुमार , राजदरबार में उपस्थित हुआ। वहां पर एक जमघट सा लगा था के एक तोता चोर कैसे हो सकता है।
अब समस्या थी कि  तोते से क्या और कैसे पूछा जाये ...!
तभी तोता मानवीय आवाज़ में बोल पड़ा , " महराज , मुझे मुक्त कर दिया जाय , मैं बेकुसूर हूँ , दूर काली पहाड़ियों पर एक महा राक्षस है हम उसी के गुलाम है। उसी ने हमें अपने माया जाल में बाँध कर यहाँ भेजा था और हमने चोरी की।"
राजा सुमेर सिंह एक दयालु व्यक्ति था। उसने तोते को मुक्त कर दिया।
लेकिन समस्या तो वहीँ की वहीँ ही रही। अब काली पहाड़ियाँ कहाँ थी , किसे मालूम , खोज के लिए किसे भेजा जाए ...! तभी बड़ा राज़  कुमार आगे हो कर अपने जाने की आज्ञा मांगने लगा। और राजा ने अनुमति भी दे डाली।क्यूँ कि वह राजा था और उसकी प्रजा उसकी संतान थी। इसलिए उसने प्रजा या अपनी सेना में से किसी को भेजने के बजाय अपने पुत्र को ही भेजना उचित समझा।
अगले दिन राजकुमार वीर सिंह घोड़े पर सवार हो कर चल दिया। कई दिन तक चलता रहा, पूछता रहा काली पहाड़ियों का पता । एक दिन उसने पाया कि सडक का रास्ता तो ख़त्म हो गया है और आगे घना  जंगल था। उसमे राह ढूंढता हुआ चल ही रहा था। उसे दूर एक बूढी औरत, जिसने  सर पर बड़ा सा लकड़ियों का गट्ठर लिया हुआ था, नज़र आई।
उसने बेरुखी से उसे पुकारा , "ए बुढ़िया ...! जंगल के पार जाने का रास्ता कौनसा है और तूने किन्ही काली पहाड़ियों के बारे सुना है क्या ...?"
पर यह भी क्या बात हुई ...!अब राजकुमार को क्या ऐसे बोलना चाहिए था ...? एक बाहुबली को एक मजबूर और लाचार  के साथ ऐसी वाणी और भाषा में तो नहीं बोलना चाहिए था।
तभी वह बूढी औरत बोल पड़ी , " पहले बेटा  मेरा ये गट्ठर तो उठा कर मेरी झोंपड़ी तक ले चलो ..."
" मुझे इतना समय नहीं है जो मैं फ़ालतू के काम करूँ ...!", राज़ कुमार उपेक्षा से कहता हुआ घोड़े को आगे की तरफ ले चल पड़ा।
बहुत मुश्किल से जंगली जानवरों से बचता कभी लड़ता आखिरकार वह जंगल से पार पहुँच ही गया। आगे विशाल नदी दिखाई पड़  रही थी। अब एक बार फिर से परेशानी में पड़  गया राज़ कुमार। अब क्या किया जाये , सोच में पड़ गया वह। फिर हिम्मत करके आस -पास नज़र दौड़ाई तो वहां एक लकड़ी का  बड़ा सा  चौकोर पटरा सा था। अपने घोड़े को वही छोड़ कर उस पर सवार हो कर नदी भी पार कर ली। आगे एक खुला मैदान आया। वहां पर उसने क्या देखा ...!
उसने देखा के वहां पर असंख्य पत्थर की मूर्तियाँ थी और वो भी इंसानों जैसी। उसे बहुत हैरानी हो रही थी कि  यहाँ वीराने में ये मूर्तियाँ कौन बनता होगा भला ...!
वह चलता रहा लेकिन तभी ....
"ओ राज़ कुमार ...!  कहाँ जा रहे हो , एक बार मुड़  कर तो देखो ...!" कोई पीछे से पुकार रहा था।
राज़ कुमार ने जैसे ही मुड़ कर देखा और वह पत्थर का बन गया।
उधर वीर पुर में सभी चिंता में डूबे  हुए थे। राजकुमार तो बहुत दिन हो गये ना खबर थी और ना ही वापस आया।इस पर राजकुमार समीर सिंह ने जाने की आज्ञा मांगी , उसका कहना था के वह चोर और अपने बड़े भाई दोनों का पता ले कर आएगा।
वह भी चल पड़ा उसने भी उस बूढी औरत की अवहेलना की और आखिरकार वह भी  पत्थर की मूर्ति में बदल गया। ऐसा ही हाल तीसरे राजकुमार का हुआ।
और अब बारी थी छोटे राजकुमार जोरावर सिंह की। पर इस बार राजा भी सहमत नहीं था और ना ही राजा के सलाहकार ... और रानी माँ का भी बुरा हाल था। वह अपने पुत्रों के वियोग में बार-बार गश खा कर गिरती रहती थी। लेकिन जोरावर सिंह अपनी बात पर अटल रहा और आखिर में उसे अनुमति मिल ही गयी।
जोरावर सिंह भी चल पड़ा। उसको भी  वही घना जंगल दिखा और वही सामने आती हुई  बूढी औरत ...!
लेकिन राजकुमार बहुत विनम्र और दयालु था। वह घोड़े से उतरा और बूढी औरत के पास जाकर बोला," माँ , लाओ ये मुझे दो , कितना बोझ है इसमें आपके कैसे उठेगा यह , मुझे बताओ , लाओ मैं इसे रख आता हूँ।"
बूढी औरत ने उसे  गट्ठर थमा  कर अपनी झोपडी की तरफ ले गई।
वहां उसने राजकुमार को पानी और थोडा गुड खाने को दिया जिससे उसके अन्दर एक शक्ति का सा संचार हुआ लगा। जब राजकुमार ने बूढी औरत से अपने भाइयों और काली पहाड़ी के बारे में पूछा तो ...
अचानक उसने क्या देखा ...!
वो बूढी औरत तो एक सुंदर से देवी में बदल गयी। उसने बताया कि  वह " वन-देवी " है। वह ऐसे ही वेश बदल कर लोगों की परीक्षा लेती  और रक्षा भी करती है। क्यूंकि जोरावर बहुत ही नेक इन्सान था इसलिए देवी ने उसकी सहायता करने का निश्चय किया।
देवी ने उसे उसे एक पतली रस्सी का बड़ा सा गोला दिया और कुछ अनाज के दानो की पोटली दी।
और  कहा, " इस गोले का एक सिरा पकड कर इसे जमीन पर छोड़ देना , यह लुढकता हुआ तुमको जंगल पार ले जायेगा। आगे एक नदी आएगी , उसमे तुम यह पोटली के दाने डालते रहना , जिससे नदी में तुम्हारे लिए राह खुद - ब - खुद ही बनता जायेगा। नदी पार कर लोगे तो तुम्हें आगे एक विशाल मैदान नज़र आएगा। उस मैदान में तुम्हें बहुत सारी पत्थर की मूर्तियाँ नज़र आएगी ,वे पत्थर की मूर्तियाँ असल में इंसान ही है। काली  पहाड़ी के राक्षस   ने उसके आसपास एक माया जाल फैला रखा है। जो भी उसके क्षेत्र में प्रवेश करता है तो उसको पीछे से कई सारी आवाजें पुकारने लग जाती है।जो भी मुड़  कर देखता है वही पत्थर हो जाता है। अब तुम यह ख्याल रखना के पीछे मुड़  कर नहीं देखना है। उसके बाद तुम अपने विवेक से काम लेते हुए आगे बढ़ना ..."
राजकुमार को आशीर्वाद दे देवी अंतर्ध्यान  हो गयी।
राजकुमार भी चल पड़ा रस्सी वाले गोले के पीछे-पीछे ...बड़ी सुगमता से जंगल पार कर लिया। अब सामने नदी थी। अपने घोड़े को वहीँ छोड़ कर दानो वाली पोटली से दाने नदी में डालता रहा और नदी भी रास्ता बनाती रही। सामने मैदान और उसमे खड़ी मूर्तियाँ देख वह समझ गया कि अब राक्षस का मायावी क्षेत्र आ गया है।
सामने ही काली पहाड़ी थी।
 राजकुमार आगे बढ़ चला।  उसको भी पुकारा जाने लगा पीछे से । एक बार तो वह ठिठक ही गया जब उसे लगा उसे उसके तीनो भाई पुकार रहें है। पर वह सावधान था ... मन तो भर आया था अपने भाइयों की पुकार पर लेकिन उसने खुद  को दृढ कर लिया था  , उसे मुड़  कर तो देखना ही नहीं है।
अब वह पहाड़ के सामने था। उस पर जाने का रास्ता तो सामने ही था। सोच ही रहा था के ...अचानक धरती में कुछ कंम्पन सा महसूस हुआ और आसमान में गर्जना सी सुनायी दी। सामने से राक्षस चला आ रहा था। राजकुमार को कुछ नहीं सुझा तो वह भाग कर एक पेड़ के पीछे की झाड़ियों में छुप  कर देखने लगा।
राक्षस बहुत विशालकाय था। बड़े- बड़े दांत , नाख़ून  और सर पर सींग और सारे शरीर पर बाल थे। पास से गुज़रा तो भयंकर बदबू  आ रही थी।
उसके जाने के बाद राजकुमार जल्दी से पहाड़ी पर चढने लगा। थोड़ी देर में की एक महल के सामने था। बाहर का दरवाज़ा खुला था। वहां  दरवाज़े पर कोई भी नहीं था और राक्षस को जरूरत भी क्या थी।उसने  अपनी माया ही ऐसी फैला रखी थी कोई उसके महल तक जा ही नहीं सकता था।
अंदर जा कर उसने देखा , बहुत सुन्दर दृश्य था वहां पर बहुत सारे  कक्ष थे हर कक्ष  की सज्जा दर्शनीय थी।लेकिन एक कक्ष के पास से गुज़रा तो उसे धीरे - धीरे रोने की आवाज़ सुनाई दी तो वह रुक गया और जहाँ से रोने की आवाज़ आ रही थी उस कक्ष की तरफ बढ़ चला। एक बार तो उसने सोचा कहीं ये भी कोई राक्षस की माया ना हो।फिर भी वह हिम्मत करके भीतर की ओर बढ़ा।
देखा एक सुंदर सी लड़की रोये जा रही थी।उसे देख कर घबरा कर खड़ी हो गयी। राजकुमार ने उसे डरने को मन करते हुए अपनी सारी कहानी  बताई।
लड़की ने बताया ,वह सुंदर नगर की राजकुमारी फूलमती  है। राक्षस ने उसके पिता से कोई शर्त लगाई थी और राजा शर्त हार गए तो उसके बदले राक्षस उसे उठा लाया। राजकुमार से हैरान हो कर वह बोली ," तुम यहाँ क्या करने आये हो राक्षस आते ही तुमको खा जायेगा।"
पर राजकुमार तो राक्षस को मार कर उसका आतंक खत्म करने आया था। वह फूलमती से महल और राक्षस का राज़  पूछने लगा।
राजकुमारी भी क्या बताती। वह तो जब आयी थी सिवाय रोने के अलावा कुछ भी नहीं किया था।उसने राजकुमारी के साथ महल में घूमना शुरू कर दिया।उन्होंने देखा सभी कक्ष खुले हैं। एक कक्ष पर छोटे -छोटे सात ताले एक क़तर में क्रमवार लगे थे, देख कर दोनों हैरान से हुए। फिर दोनों ने एक योजना बनाई।
कुछ देर बाद जब राक्षस आया तो चकित रह गया ...! राजकुमारी रो नहीं रही थी बल्कि बाहर खड़ी थी।राक्षस के पूछने पर उसने बताया कि  जब उसे वहीँ रहना है तो वह मन लगाने की कोशिश कर रही है। इसके बाद वह धीरे - धीरे राक्षस से   घुलने मिलने भी लगी। एक दिन बातों ही बातों  में वह पूछ बैठी राक्षस से , " तुम कितने वीर हो और बहुत मायावी भी तो तुम्हें तो कोई मार ही नहीं सकता।"
राक्षस शरीर से बलशाली पर बुद्धि से जड़ ...!बोल पड़ा , " हाँ मुझे कोई मार नहीं सकता क्यूंकि मेरी जान तो एक तोते में बसी है ,उस तोते को मैंने मेरे बाग़ में छुपा कर रखा है। इस महल में एक कक्ष है उस  पर मैंने सात ताले लगा रखे हैं। उसमे भी सात कमरे है उसके बाद एक बाग़ है उसमे एक आम के पेड़ पर एक पिंजरे में तोता है अगर उसे कोई मार दे तो ही मैं मर सकता हूँ ...! लेकिन चाबी सदैव मेरे पास ही रहती है।"
राजकुमार छुप कर सारी  बात सुन रहा था।
अब सिर्फ चाभी ही हासिल करनी थी राजकुमार ने , मंजिल तो उसके सामने ही थी। और यह भी संयोग ही था के महीनो ना नहाने वाला राक्षस उस दिन नहाने चला गया। उसके जाते ही फूलमती ने चाबी उठा कर राजकुमार को दे दी। राक्षस को  राजकुमारी  ने बातों में उलझा लिया। और बातों ही बातों में राक्षस चाबी को भूल ही गया। महल से बाहर  भी  चला गया।
उसके जाते ही बिना मौका गवांये वे दोनों बंद कक्ष के सामने थे। एक -एक कर के ताले खोलने लगे। सातवे ताले को खोल ही रहे थे के राक्षस महल में आ पहुंचा। राक्षस को थोड़ी दूर जाते ही चाबी की याद आ गयी थी।अब एक तरफ तो राक्षस आगे की और बढ़ रहा था।दूसरी तरफ वे दोनों ताला खोल चुके थे। और भागते हुए आगे जो क्रमवार कमरे बने थे उनके दरवाज़े धकेल कर खोलते हुए आगे भागते हुए जा रहे थे।
राक्षस के क्रोध की पारावार ही नहीं थी। उसके क़दमों से धरती और हुंकार से आकाश भी काँप  रहा था।वो बढ़ा चला जा रहा था।
तब तक वे दोनों बाग़ में पहुँच चुके थे। अब तलाश थी उनको तोते की ...! उस आम के पेड़ की जिस पर तोता था ...!
तभी सामने उनको पिंजरे में तोता दिख गया।
" नहीं ...!" राक्षस जोर से दहाडा।
" उसे हाथ मत लगाना ...!"राक्षस फिर दहाडा ...
लेकिन राजकुमार ने तोते को हाथ में ले लिया था और उसने तोते की एक टांग मरोड़ दी।
राक्षस एक टांग से लंगड़ा हो गया। फिर तोते की दूसरी टांग मरोड़ी और राक्षस नीचे गिर पड़ा लेकिन हाथों के सहारे रेंगता आगे बढ़ गया।
राजकुमार ने तोते का एक पंख मरोड़ दिया तो राक्षस का एक हाथ टूट गया। दूसरा पंख मरोड़ा तो दूसरा हाथ टूट गया।
और आखिर में तोते की गर्दन मरोड़ी तो राक्षस निढाल हो कर गिरा और मर गया।
उसके मरते ही उसका माया जाल भी खत्म हो गया। बाग़ के पेड़ों पर बैठे  सभी तोते उड़ गए उन्मुक्त हो कर आसमान में।
काली पहाड़ी भी अपने असली स्वरूप में आ कर  अपनी सुनहरी आभा से चमक रही थी।
जितने भी लोग मूर्तियों में बदले हुए थे वे सभी  फिर से इन्सान बन गए थे। राजकुमार अपने भाइयों से मिल कर बहुत ही खुश हुआ। जोरावर सिंह ने अपने भाइयों को  राजकुमारी का परिचय दिया और बताया अगर फूलमती  का सहयोग नहीं मिलता तो  राक्षस का मारा जाना संभव नहीं था।
फिर सभी वीर पुर की ओर चल पड़े। वहां पर सभी का बहुत भव्य स्वागत हुआ। राजकुमारी फूलमती के पिता राजा सुंदर सेन को भी बुलाया गया और राज़ कुमारी को उनके साथ विदा कर दिया।
इसके बाद वहां पर कोई भी अपराध नहीं हुआ सभी  सुख -चैन के साथ रहे।

उपासना सियाग






शुक्रवार, 20 जून 2014

कभी नानी सुनाती थी कहानी

कभी नानी सुनाती थी
कहानी
एक था राजा , 
एक थी रानी। 

कभी -कभी
लम्बी रातों की भांति ही ,
 होती थी
बहुत लम्बी होती थी
कहानी। 

कहानी 
बहादुर राजकुमार की
और
राक्षस की कैद में बंद
राजकुमारी की। 

सुना करते थे
उठा ले गया राक्षस
राजकुमारी को
एक आस -एक विश्वास होता था
नानी की बातों से ,
बच्चों के मन में 
कि
बहादुर राजकुमार है न !
राजकुमारी बचा ली जाएगी  ,
राक्षस मारा जायेगा। 

आने वाली पीढ़ी की नानी
 क्या सुनाएगी कहानी 

राजा -रानी तो अब भी हैं ,
और
राजकुमारियाँ भी हैं !
 वे अब भी
राक्षसों की कैद में होती है ,
लेकिन
वो बहादुर राजकुमार
ना जाने कहाँ गुम
हो गए हैं। 

राक्षस अब मारे नहीं जाते
 फिरते हैं अट्टहास करते

नानी चुप ही रहेगी तब
शायद
बच्चों को दिला न पायेगी वह
विश्वास
राजकुमारी के बच जाने  का !
अब नानी क्या सुना पाएगी कहानी !




मंगलवार, 1 अप्रैल 2014

पुलकित की शरारत ( बाल -कथा )



" टन -टन !!" घंटी बजी।
यह स्कूल की आधी -छुट्टी की घंटी बजी है।
सभी बच्चे अपने -अपने टिफिन लिए कक्षा से बाहर  हो लिए।  केशव , राघव , विपुल , प्रतीक और पुलकित ये पांच बच्चे जो की छठी कक्षा के छात्र हैं  और आपस में मित्र भी हैं । पुलकित इनमे से सबसे ज्यादा शरारती था। उसे कोई ना कोई शरारत सूझती ही रहती है। नित नए तरीके उसकी खुराफाती खोपड़ी में आते ही रहते थे।
 " आज  अप्रैल -फूल पर किसको मूर्ख बनाया जाये ?" पुलकित अपनी शरारती आँखे चमकते हुए बोला।
" इस बार सोच समझ कर ही कुछ सोचना ! पिछली बार की तरह स्कूल से निकलने की नौबत ना आ जाये। "केशव बोला।
" हाँ सच ! पिछली बार घर में भी तो कितनी डाँट पड़ी थी !" प्रतीक जो स्वभाव में  सबसे सीधा बच्चा था , बोला।
राघव कुछ बोलता इससे पहले पुलकित बोल पड़ा कि उसने तो सोच लिया कि इस बार भी मूर्ख  तो कोई न कोई बन के ही रहेगा।
" क्यूँ ना हम अपने इतिहास के अब्दुल गफ्फार सर को ही मूर्ख बना दें !" पुलकित ने एक आइडिया दिया।
" अरे नहीं भई !! गफ्फार सर तो उल्टा लटका देंगे !" इस बात पर बाकी बच्चों ने  असहमति प्रकट की।
" लेकिन मैंने तो सोच लिया !" पुलकित बोला।
" तुम सब कक्षा में जाओ और मेरा इंतज़ार करो। आधी -छुट्टी के बाद का पीरियड गफ्फार सर का ही तो होता है। " पुलकित यह कह कर स्कूल के ग्राउण्ड में आ गया। बाकी बच्चे कक्षा में चले गये।
सर भी कक्षा में आ गये कि पुलकित भागा  हुआ , हाँफता हुआ दरवाज़े पर खड़ा था। ( वह  ग्राउंड में तीन-चार चक्कर दौड़ लगा कर आया था इसलिए हांफ रहा था। )
" सर ! सर !! "
सर भी घबरा गये कि पुलकित को क्या हुआ।
" सर !!! अभी मैं आपके घर के पास से निकला तो देखा कि आपकी पत्नी की  तबियत ख़राब है उनको हॉस्पिटल ले कर जा रहे हैं !"
सर तो सचमुच घबरा गये। बिन कहे ही घर की और चल पड़े।
     सभी बच्चे खिलखिला कर हंस पड़े कि आज तो सर से छुटकारा मिला और उनको बुद्धू बना दिया।
अगले दिन पुलकित सर से डर  के कारण स्कूल नहीं गया। पेट दर्द का बहाना कर के सोता रहा। उस दिन शनिवार था। इसलिए पुलकित ने सोचा कि सोमवार तक तो सर भूल जायेंगे और माफ़ कर देंगे।
      रविवार की सुबह अब्दुल गफ्फार सर की आवाज़ सुन कर पुलकित डर गया। सर उसके पापा से बातें कर रहे थे। उसने ध्यान से सुनने की  कोशिश तो की लेकिन कुछ भी समझ नहीं आया।
" पुलकित ! तुम्हारे सर आये हैं ! तुम्हें बुला रहे हैं। " माँ ने आकर कहा तो वह चौंक उठा।
" मुझे क्यूँ बुला रहे हैं ? " वह सहमते हुए बोला।
वह डरते सहमते से ड्राइंग रूम में गया।  सर ने उसे अपने पास बुलाया और पास बिठाया।
   बोले , " माना कि तुमने मुझे मूर्ख बनाया था। लेकिन मेरी पत्नी बीमार ही रहती है। उसे हृदय रोग है। उस दिन उसकी सचमुच ही तबियत खराब थी अगर मैं समय से घर नहीं जाता और हॉस्पिटल नहीं लेकर जाता तो जाने क्या होता। तुमने मज़ाक में ही सही लेकिन मेरी बहुत मदद की है। इसलिए मैं तुम्हें दुआ देने ही आया हूँ। "
सर  चले गए।  उसके पापा को राहत मिली कि इस बार उसकी शरारत से किसी को नुकसान नहीं पहुंचा। फिर भी उसने झूठ तो बोला ही था। पहले स्कूल और फिर घर में पेट दर्द का बहाना। इसलिए उसको एक सप्ताह तक उसके मन पसंद टीवी के प्रोग्राम देखने की पाबंदी लगा दी गई। पुलकित ने भी मन ही मन शरारत कम कर देने की  कसम खा ली।

उपासना सियाग ( अबोहर )

बिल्ली मौसी को अप्रैल -फूल बनाया।



एक थी
छोटी सी चिड़िया
उड़ती रहती
गाँव और शहर की गालियाँ।

एक दिन
देखे उसने
बिखरे दाने बहुत से

दाने चुगने की धुन में
ना देखा उसने
गिरे हैं वो कीचड़ में

खाने  के लालच में
पैर भी धँसवाये
पर भी लिए भिगो

नन्ही सी चिड़िया
घबराई अब तो
 जब देखा सामने
आ रही है बिल्ली मौसी

बिल्ली मौसी भी हर्षाई
मुख पर जीभ लपलपाई
सोचा ,
" अहा ! आज तो दावत
बिन मेहनत  ही पाई !"

चिड़िया थी तो नन्ही
समझदार भी थी बहुत

बोली मौसी
मुझे जरा बाहर निकालो
नहला दो जरा
कीचड़ तुम्हारे मुहं में तो
ना जायेगा

बिल्ली मौसी
अभी तो गीली हूँ मैं !
पानी से भरी
तुमको ना भा सकूंगी
जरा सूखने तो दो !

मूर्ख बिल्ली
बैठी इस आस में
चिड़िया सूखेगी
तब खा जाऊँगी उसे

सूख गए पर चिड़िया के  ...

फड़फड़ाये उसने अपने पर
जा बैठी ऊँची डाली पर
चहकने लगी हो जैसे
बिल्ली मौसी को अप्रैल -फूल बनाया।






सोमवार, 17 मार्च 2014

खुशियों के रंग (बाल कथा )

    त्यौहार का दूसरा नाम होता है खुशियां। कोई भी त्यौहार हो जैसे -जैसे नज़दीक आने लगता है। मन में अपने आप ही उल्लास का समावेश होने लगता है।होली तो सभी का प्रिय त्यौहार होता है। होता भी क्यूँ नहीं इस दिन रंग -पानी खेलने की पूरी छूट होती है।
  लेकिन होली तो आने को है और नन्हा रघु उदास है। क्यूँ उदास है वो ? क्यूंकि वह पिछले दो सालों की तरह इस बार भी होली नहीं मनाएगा। मन मसोस रहा है कि इस बार भी घर की छत से ही दूसरे बच्चों को रंग खेलते हुए देखेगा। उसे याद आ रहा है कि किस तरह वह पंद्रह दिन पहले ही अपने मित्रों के साथ होली में रंग खेलने की योजना बनाने लग जाता था। छोटी कक्षा में था इसलिए पढाई का भी ज्यादा जोर नहीं था और तब तक परीक्षाएं भी हो जाती थी।
  परीक्षाएं तो इस बार भी दो दिन पहले ही ख़त्म हो जायेगी। फिर क्यूँ नहीं खेल सकता वह ?
रघु धूप में रखी चारपाई पर लेटा सोच रहा था। तीन साल पहले होली के दिन जब वह होली खेल कर घर लौटा तो देखा कि उसके माँ -पापा बदहवास से थे। उसकी मम्मी उसके छोटे भाई श्याम को तैयार कर चुकी थी। उसे देखते ही उसे भी जल्दी से स्नानघर की  तरफ ले चली और कहा की जल्दी से नहा ले। वह सोच में पड़  गया कि आज माँ  ने उसे नहलाया क्यूँ नहीं। हर बार तो वह खुद रगड़ -रगड़ कर रंग छुड़ाती है उसका।
    जैसे तैसे नहा कर बाहर आया तो उसने अपने पापा के रंग लगा-उतरा चेहरा बदरंग सा दिखा। थोड़ी ही देर में वे अपनी कार में सवार हो कर गाँव की  तरफ जा रहे थे। रघु ने पूछा तो माँ  ने रोते हुए बताया कि उसके दादा जी नहीं रहे।
    वह सकते में आ गया। यह तो उसने सोचा ही नहीं था कि ऐसा भी दिन आएगा कभी। वह तो सोचता था कि सभी साथ -साथ ही रहेंगे। कोई छोड़ कर भी जा सकता है।ऐसा तो कभी नहीं सोचा था उसने।  गाँव जाकर माहौल देख कर वह और उसका भाई सहम से गए। दादा जी कितना प्यार करते थे सभी को। जब भी उनके पास रहने को आते थे तो घर में उत्सव  जैसा माहौल बन जाता था। अब कौन प्यार करेगा उसे। सोच कर मन में हूक सी उठी लेकिन जोर से रो भी नहीं सका बस सहमा सा रहा। दादा जी को जाते देखता रहा।
    कुछ दिन बाद वे सब शहर आ गए।
     जिंदगी फिर से चल पड़ी अपनी राह पर। लेकिन दादा जी की  कमी तो हमेशा ही रहती थी रघु के जीवन और मन में। वह बहुत याद करता था उनको।
     " रघु !" माँ ने पुकारा तो वह नीचे आँगन में आ गया।
" माँ , क्या इस बार भी हम होली नहीं मनाएंगे ?" रघु की आवाज़ में कई सारे भाव एक साथ थे।
" नहीं बेटा , होली के दिन तेरे दादा जी की मृत्यु हुई थी। इसलिए हम कोई भी त्यौहार और ख़ुशी इस दिन नहीं मनाएंगे। " माँ ने समझाते हुए कहा।
" लेकिन माँ ! दादा जी भी तो कितना खुश हो कर रंग खेलते थे। आज जब हम नहीं खेलेंगे तो क्या उनकी आत्मा खुश होगी। " रघु ने अपनी बात रखने की कोशिश की।
" ओह ये आत्मा की बातें मुझे नहीं मालूम। जो बड़ों ने परम्परा बना दी वही मानी जायेगी। ज्यादा बातें बनाना अच्छी बात नहीं है। " माँ थोड़ा नाराज़ होकर बोली।
  " बातें बनाना क्यूँ नहीं अच्छी बात है। रघु सच ही तो कह रहा है। " पीछे से आवाज़ आई तो देखा दादी खड़ी है साथ में उसके पापा भी।
     उसके पापा दादी को गाँव से लेकर आये थे। घर में किसी को नहीं पता था। पापा को ऑफिस में ही फोन कर दिया तो वह वही से लेने चले गए थे। रघु दादी को देख बहुत खुश हुआ। दौड़ कर गले लग गया।
   दादी ने प्यार से रघु को गले लगा कर कहा कि इस बार हम सब होली मनाएंगे। जो परम्परा खुशियों में आड़े आए वह बदल देनी चाहिए। बच्चे अगर त्यौहार पर ही उदास रहेंगे तो इसके दादा जी की आत्मा कैसे खुश रहेगी। कह कर दादी ने अपने बैग से रंग और मिठाइयां निकाल  कर  दी।  रघु और उसका भाई श्याम दोनों ही बहुत खुश थे। तीन साल बाद फिर से होली के रंगों के साथ -साथ खुशियों के रंग भी बिखरेंगे।

उपासना सियाग 

शनिवार, 1 मार्च 2014

मम्मा आप चिंता मत करो...

   बच्चे  दो प्रकार के होते हैं। एक तो न पढ़ने वाले और दूसरे वाले ना पढ़ने वाले। यहाँ थोड़ा सा सुधार करते हैं कि कम पढ़ने वाले। पढ़ने वाले बच्चे तो समय पर होमवर्क और रिविज़न करते रहते हैं। और कम पढ़ने वाले बच्चे ! वे सिर्फ परीक्षाओं में ही पढ़ते हैं।
    कम पढ़ने वाले बच्चों में ग्यारहवीं कक्षा में पढ़ने वाला मेरा छोटा बेटा प्रद्युम्न भी है। आज परीक्षा दे कर आया तो मेरे पूछने पर बताया कि उसके सौ में से 85 नम्बर आ जायेंगे।
 कमाल का आत्म विश्वास ! मुझे सुन कर हंसी आ गई।
   एक तरफ उसके चाचा का बेटा जो कि 8th में ही है। उसकी पहले परीक्षा की  चिंता से और अब रिज़ल्ट की  चिंता से नींद उड़ी  हुई है। यहाँ प्रद्युमन ने खुद ही रिजल्ट निकाल  दिया।
 मुझे याद आया जब वह सातवीं कक्षा में था। मैं बहुत चिंतित थी कि वह कैसे पास हो पायेगा।
  वह प्यार से गले में बाजू डाल कर बोला , " मम्मा आप चिंता मत करो। हमारी सिस्टर ने कहा है कि 33 नंबर वाला पास है। मैं 35 नंबर तो पक्का ले आऊंगा। "
   मुझे हंसी आ गई। सोचा अब सारे  बच्चे तो प्रथम नहीं आ सकते। पढाई के पीछे बच्चे का मासूम बचपन किसलिए खोना। लेकिन चार साल तक होस्टल में भेजना पड़ा इस पढाई के लिए ही !
  अब जब घर में है तो कोई फ़िक्र नहीं है उसे। मुझे तो फ़िक्र है !
   






लेकिन उसे फ़िक्र में नहीं डालना चाहती। कुछ बच्चे 12th के बाद सम्भल जाते हैं। इसी आस में उसके साथ हंस देती हूँ।

सोमवार, 17 फ़रवरी 2014

अनमोल उपहार ( बाल कथा )

      नन्ही सी पीहू खिड़की में से देख कर ही खुश हो रही थी चिड़ियों का चहचहाना। जब से वह अपने चाचा के पास इस बड़े शहर में पढ़ने -रहने आयी है तब से वह इन चिड़ियों को खिड़की में से ही देखा करती है। शहरों में ना पेड़ दिखाई देते है ना ही पंछी। उसे अपने गाँव के हरे -भरे खेत याद  आते और आँगन में लगा नीम का पेड़ भी।
     उसे  हरियाली से , पेड़  -पौधों से बहुत लगाव था। उसने आँगन में कई सारे रंग -बिरंगे फूलों के पौधे लगा रखे थे। जब  वह देखती किसी पौधे में कली खिली है या फूल खिलने वाला है। किलक पड़ती ! फूल , पौधे पर ही नहीं बल्कि उसके भोले से प्यारे से मुख पर भी खिल पड़ते।
     पीहू के पिता गांव में रहते थे। उसके एक भाई और एक बहन गाँव में ही थे। उसके चाचा शहर में नौकरी करते थे। चाचा के कोई संतान नहीं थी।  इस बार गाँव गए तो वे पीहू को साथ ले आये कि उनका अकेला पन भी दूर हो जायेगा और पीहू पढ़ भी लेगी। पीहू के पिता को क्या ऐतराज़ हो सकता था भला। वह सहर्ष मान गए। पीहू गाँव नहीं छोड़ना चाहती थी। उसे अपने फूलों से लगाव था। माँ-बाबा के समझाने पर वह मान तो गई लेकिन मन अपना वहीँ छोड़ आई।


     तीसरी मंज़िल पर चाचा का घर था। बाहर निकलो तो चारों और पत्थर के मकान ही नज़र आते। उसका मन कुम्हलाए हुए पौधे कि तरह होने लगा था।  चाचा -चाची बहुत प्यार करते थे। बहुत सारे  खिलौने भी लाकर दिए। वह खेलती तो थी लेकिन मन बहुत उदास रहता। रात को जब सोती तो अपने पौधों को बहुत याद करती।
 " पीहू ! आओ , स्कूल को देर हो रही है। " चाची ने उसे आवाज़ दी तो वह उदास सी चल पड़ी स्कूल के लिए तैयार होने के लिए।
      चाची ने पीहू को टिफिन पकड़ाते बहुत सारा लाड़ किया। वह चाचा के साथ स्कूल चली गयी।
  दोपहर में जब घर लौटी तो देखा तो सामने उसके बाबा थे।  वह खुश हो कर उनसे लिपट गई। बाबा ने गोद में बैठा लिया। बहुत सारा सामान माँ ने उसके लिए भेजा था। जब उसने अपने पौधों के बारे पूछा तो बाबा हंस पड़े और उसे गोद में उठाये ही बालकनी की  तरफ ले चले। वे उसके लिए एक नन्हा सा पौधा लाये थे। उससे बोले कि इसे वह एक गमले में लगा कर जायेंगे।  वह  ही इसकी देख भाल करेगी। पीहू के चाचा ने एक गमले में इसे लगा दिया।
      पीहू जल्दी से पानी ले आई और गमले में डाल  दिया। अब उसे इंतज़ार था कि कब इसमें फूल खिले लेकिन उसके मुख पर तो फूल खिलने  लग गए थे खुशियों के।

( चित्र गूगल से साभार )

बुधवार, 12 फ़रवरी 2014

टुनिया की सूझबूझ ( बाल कथा )

   माँ कब से आवाज़ लगा रही थी। टुनिया को न जाने  सुनाई दे भी रहा  था भी कि नहीं। रज़ाई में दुबकी  पड़ी थी। उसके दोनों भाई -बहन स्कूल के लिए तैयार हो गए थे। और वह अभी तक उठी ही नहीं थी।
       माँ भी क्या -क्या करे सुबह -सुबह। कितने काम होते हैं। बच्चों को उठाओ। उनके कपड़े निकाल कर दो। फिर उनके टिफिन भी तैयार करो।
    " टुनिया !" माँ अब जोर से बोली।
 टुनिया ने धीरे से आँखे खोली और कहा कि उसके बदन में दर्द है वह उठ ही नहीं पा रही है। माँ ने छुआ तो देखा उसका बदन तो बहुत गर्म था। बुखार हो गया था टुनिया को। माँ ने माथा सहलाते हुए उसे सोये रहने को कहा और उसके भाई -बहन को स्कूल के लिए रवाना कर दिया।
     टुनिया को दवाई दे कर माँ ने उसे सुला दिया। घर के काम में व्यस्त हो गयी। उसे नींद तो नहीं आ रही थी लेकिन बुखार की  वजह से आँखे भी नहीं खुल रही थी। माँ के काम करने कि खटर -पटर उसे सुनायी दे रही थी। माँ शायद बाबूजी के लिए खाना तैयार कर रही थी। उनके ऑफिस जाने  का समय हो रहा था।
   बाबूजी ने ऑफिस के लिए निकलते हुए टुनिया को दुलराया और चल दिए। तभी उसे माँ से कोई जोर से बोलते हुए एक शोर सा सुनाई दिया। उसने ध्यान दिया कि कोई मांगने वाली थी जो उसकी माँ से अनुनय कर रही थी कि वे बहुत भूखी है कुछ खाने को दे दे। उसकी  माँ रसोई में चल दी ,जो रोटी खुद के लिए बनाई थी वे  देने के लिए।
    दरवाज़े पर पहुंची तो कोई नहीं था। जाने कहाँ चली गई वे दोनों औरतें। टुनिया की  माँ बड़बड़ाते हुए लौटी कि अच्छा मज़ाक है पहले मांगती है फिर खुद ही गायब हो गई। उसके पास कोई और काम नहीं है क्या !
  अब तक दवाई का असर होने लगा था। टुनिया बिस्तर छोड़ कमरे से बहार आ गई। माँ ने कहा कि वह ड्राईंग -रूम में बैठ जाये। वहाँ खिड़की से धूप आएगी तो उसे अच्छा लगेगा। आँगन में तो हवा भी चल रही है।


     वह सोफे पर चुप कर के लेट गई। उसकी आँखे कभी मुंद  रही थी तो कभी खुल रही थी। अचानक उसे सामने की  दूसरी खिड़की पर लगा पर्दा हिलता हुआ दिखा और नीचे दो जोड़ी पैर दिखे। वह घबरा गई।
    वह छोटी तो थी लेकिन इतनी भी नहीं कि समझ ना रखे। वह समझ गयी कि ये हो न हो वो दोनों मांगने वाली औरतें  ही है। माँ जब रोटी लेने गयी तब ये अंदर आ कर पर्दे के पीछे छुप गई होंगी। वह चुपके से उठी और माँ को धीरे से जा कर सब बता दिया। अब माँ भी घबरा गयी।
      टुनिया को  माँ ने  चुप रहने का इशारा करते हुए उसका हाथ पकड़ कर जल्दी से घर के बाहर आ गई। बाहर आकर पड़ोस के लोगों को इकट्ठा किया और सारी  बात बताई।  घर में जा कर माँ ने खिड़की से पर्दा हटा दिया। अचानक पर्दा हटाया तो वे औरतें डर गयी। उनके पास  चाकू और घास काटने वाली दरांती बरामद हुई।
      पुलिस उन औरतों को हिरासत में लेते हुए आस-पास खड़े सभी लोगों से सावधान रहने का सबक देते हुए चल पड़ी।  और टुनिया की बहुत  सराहना की कि उसकी सूझबूझ से एक लुटेरा गिरोह को पकड़वाने में बहुत मदद की है। सभी  टुनिया की सूझबूझ की प्रशंसा कर रहे थे। माँ को अपनी बेटी पर नाज़ हो रहा था।

उपासना सियाग
( चित्र गूगल से साभार )